‘‘ अमर शहीद सन्त कँवरराम साहिब का संक्षित जीवन परिचय’’

सिन्धु घाटी की सभ्यता विश्व की प्राचीनतम् सभ्यता है। सिन्धु नदी के तट पर ही वेदों की रचना हुइ थी। सिन्ध प्रान्त सन्तों, महात्माओं व ऋषियों का पावन स्थल रहा है।

सभ्यता, संस्कृति व सदाचार के लिए विख्यात सिन्धु प्रदेश में सन्त कँवरराम साहिब का जन्म जिला सक्खर के जरवारन गाँव में सिन्ध के सन्त खोताराम साहिब के वरदान से 13 अप्रैल 1885 ई. में हुआ था। सन्त कँवरराम साहिब के पिता श्री ताराचन्द एवं माता श्रीमती तीरथ बाई ईश्वर में विश्वास रखने वाले, सन्तों–महात्माओं की सेवा में तत्पर रहने वाले, सरल स्वभाव के थे।

बाल्यावस्था से ही सन्त कँवरराम जी की रुचि ईश्वर–भक्ति तथा भजन कीर्तन में थी। सन्त कँवरराम जी के मधुर स्वर व सद्गुणों से प्रभावित होकर सिन्ध के महान सन्त व संगीत मर्मज्ञ, सन्त खोताराम साहिब के सुपुत्र समर्थ सद्गुरु सन्त शिरोमणि सतराम दास साहिब ने उन्हें गायन, नृत्य व संगीत विद्या में प्रवीण कर दिया। अपने सद्गुरु की प्रेरणा से सन्त कँवरराम जी ने जीवन पर्यन्त भ्रमण कर सत्संग (भगत) कार्यक्रम द्वारा ईश–वन्दना, सत्य, अहिंसा, विश्व बंधुत्व व साम्प्रदायिक सौहार्द का सन्देश जन–जन तक पहुँचाया। यद्यपि सन्त सतगुरू कँवरराम जी अपने सतगुरुदेव साँईं सतरामदास जी के विशेष कृपापात्र शिष्य थे किन्तु उनके परम् धाम सिधारने के उपरान्त सन्त कँवरराम जी गुरु गद्दी पर आसीन न होकर 40 वर्षोें तक एक सेवक की भांति ही गुरु दरबार की सेवा करते रहे। आप मानवता के मसीहा थेय आपने ऊँच–नीच व अमीर–गरीब के भेद को मिटाकर समता का भाव जन–जन के हृदय में स्थापित करके लोगों के नैतिक आचरण को बल प्रदान किया। आपके परोपकारी एवं आध्यात्मिक जीवन ने लोगों के हृदय में जनकल्याण, सर्वधर्म समभाव एवं मानवीय आदर्शोें के अंकुर प्रस्फुटित कर समाज को नई दिशा प्रदान की।

सन्त कँवरराम साहिब त्याग एवं तपस्या की प्रतिमूर्ति, जीवन के मर्म को जानने वाले ऋषि, दया के सागर, दीन दुखियों, अबलाओं, यतीमों व अपाहिजों के मसीहा थे। उनकी आवाज में दर्द था, एक कशिश थी जिसको सुनकर सत्संग में उपस्थित हजारों श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे तथा एकाग्रचित होकर सत्संग में लीन रहते थे उनके भजनोें से लोगों को विश्रान्ति मिलती थी। सन्त कँवरराम साहिब के गीतों व उनकी रचनाओं में ईश्वर अल्लाह का समान रूप से समावेश होता था। इसलिए जहां हिन्दू उनके सत्संग में जाने के लिए आतुर रहते थे वहीं मुसलमान उनके गीतों व कलामों के दीवाने थे तथा उनके सत्संग में बढ़–चढ़कर हिस्सा लेते थे। वे सिन्ध के तानसेन कहे जाते थे।

सन्त कँवरराम साहिब के गीतों व कलामों से सिन्ध के गाँव–गाँव में प्रज्वलित साम्प्रदायिक सद्भाव की ज्योति फिरकापरस्त ताकतों को नागवार लग रही थी और वे इस ज्योत को बुझाने की साजिश में लग गए और इतिहास का वह काला दिन, 1नवम्बर 1939 आया, जब ‘‘रुक’’ जंक्शन पर दो बंदूक धारी कट्टरपंथियों ने सन्त कँवरराम साहिब से अपने मक्सद में कामयाब होने की दुआ मांगी। त्रिकालदर्शी सन्त कँवरराम साहिब ने उन्हें आर्शीवाद दिया। रेलगाड़ी चलने पर उन बंदूकधारियों ने सहज और शान्त भाव से बैठे सन्त को गोली का निशाना बनाया और मानवता का मसीहा, अध्यात्म की ज्योत को प्रखर करने वाले युग पुरुष, साम्प्रदायिक सद्भाव के एक मजबूत स्तम्भ, सिन्ध के महान सपूत ‘‘हे राम’’ कहकर परम्धाम सिधार गए।

इन्सानियत के लिये बलिदान हुए ऐसे महापुरुष

अमर शहीद सन्त कँवरराम’’ को शत् शत् नमन’’

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